रांची | 06/01/2026
झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग के चेयरमैन सतीश पौल मुंजनी ने पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के पेसा नियमावली को लेकर दिए गए बयानों पर कड़ा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि चंपाई सोरेन का बयान न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि यह आदिवासी समाज के बीच भ्रम, भय और अविश्वास फैलाने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश है।
सतीश पौल मुंजनी ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो लोग अपने पूरे कार्यकाल में, भाजपा शासन के दौरान, पेसा कानून को लागू करने का साहस तक नहीं जुटा सके, वे आज उसी पेसा पर ज्ञान देने का नाटक कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि झारखंड सरकार द्वारा तैयार की गई पेसा नियमावली संविधान, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों, हाई कोर्ट की टिप्पणियों और व्यापक जनपरामर्श के बाद बनाई गई है। यह नियमावली आदिवासी स्वशासन को कमजोर नहीं, बल्कि उसे संवैधानिक मजबूती प्रदान करती है।
उन्होंने कहा कि यह कहना कि पेसा नियमावली आदिवासी विरोधी है, सरासर झूठ है। सरकार ने पहली बार ग्राम सभा को स्पष्ट कानूनी अधिकार, प्रक्रिया और संरचना दी है, ताकि पेसा केवल कागजों तक सीमित न रह जाए। ग्राम सभा के अध्यक्ष के चयन को लेकर “पिछला दरवाजा” जैसी भाषा का इस्तेमाल करना चंपाई सोरेन की नीयत पर सवाल खड़ा करता है। नियमावली का उद्देश्य पारदर्शिता है, न कि किसी प्रकार की साजिश।

रूढ़िवादी परंपराओं पर झूठा हंगामा
मुंजनी ने कहा कि संविधान और पेसा अधिनियम में आदिवासी समाज की रूढ़िजन्य विधियों, सामाजिक और धार्मिक परंपराओं को पूरी तरह मान्यता दी गई है। नियमावली में इन्हें कमजोर करने का कोई भी प्रावधान नहीं है। शब्दों की गलत व्याख्या कर यह प्रचारित करना कि सरकार परंपराओं को खत्म करना चाहती है, आदिवासी समाज के साथ सीधा छल है। सरकार प्रशासनिक ढांचे में जवाबदेही तय कर रही है, ताकि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हो सके। उपायुक्त (डीसी) को जिम्मेदारी देना ग्राम सभा को कमजोर करना नहीं, बल्कि निर्णयों को लागू कराने की व्यवस्था है।
जल–जंगल–जमीन पर सरकार की प्रतिबद्धता अडिग
उन्होंने कहा कि यह आरोप पूरी तरह निराधार है कि सरकार ने जल, जंगल और जमीन से ग्राम सभा को दूर कर दिया है। पेसा के तहत ग्राम सभा को सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग में निर्णायक भूमिका दी गई है। लेकिन चंपाई सोरेन को शायद अराजकता और अव्यवस्था ही स्वशासन नजर आती है।
औद्योगीकरण पर घड़ियाली आँसू
सतीश पौल मुंजनी ने कहा कि जो लोग वर्षों तक सत्ता में रहकर टाटा, खनन कंपनियों और उद्योगपतियों के सामने चुप रहे, वे आज विस्थापन की दुहाई दे रहे हैं। झारखंड सरकार ने स्पष्ट किया है कि बिना ग्राम सभा की प्रक्रिया पूरी किए कोई भी परियोजना आगे नहीं बढ़ेगी। पिछली सरकारों के पापों का ठीकरा वर्तमान सरकार पर फोड़ना राजनीतिक बेईमानी है।
हिंडाल्को और टाटा लीज पर नैतिक अधिकार नहीं
उन्होंने सवाल उठाया कि चंपाई सोरेन यह बताएं कि भाजपा के शासनकाल में कितनी जमीनें बिना ग्राम सभा की सहमति के दी गईं। आज की सरकार हर मामले की कानूनी समीक्षा कर रही है, लेकिन अफवाह फैलाकर आंदोलन भड़काना आदिवासी हित नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ है।

शराब पर मगरमच्छ के आँसू
मुंजनी ने कहा कि पेसा पर हमला करते समय शराब का मुद्दा उछालना इस बात का प्रमाण है कि चंपाई सोरेन के पास ठोस तर्क नहीं हैं।
अंत में उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को गुमराह करने की साजिश नाकाम होगी। झारखंड सरकार आदिवासी और मूलवासी समाज को भरोसा दिलाती है कि पेसा नियमावली उनके अधिकारों की रक्षा, स्वशासन की मजबूती और संसाधनों पर उनके नियंत्रण के लिए है। झूठ, डर और अफवाह के सहारे राजनीति करने वालों को आदिवासी समाज करारा जवाब देगा। सरकार पेसा पर खुली बहस, सुझाव और सुधार के लिए हमेशा तैयार है, लेकिन आदिवासी अस्मिता के नाम पर राजनीति करने की इजाजत नहीं दी जाएगी।
