रांची | 26 दिसंबर 2025
झारखंड जनाधिकार महासभा (JJM) ने राज्य कैबिनेट द्वारा ‘झारखंड पेसा नियमावली 2025’ को दी गई मंजूरी का स्वागत किया है। महासभा ने इसे झारखंड के आदिवासी, मूलवासी समुदायों और ग्राम सभाओं द्वारा दशकों से चल रहे जल-जंगल-जमीन और स्वशासन के संघर्षों की ऐतिहासिक जीत बताया है।
महासभा के अनुसार यह नियमावली उन हजारों ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन संगठनों के सतत संघर्ष का परिणाम है, जिन्होंने अधिकारों की रक्षा के लिए लाठियां खाईं, जेल गए और गांव-गांव जाकर जनचेतना का निर्माण किया।
जन-संघर्ष और जन-भागीदारी की जीत
महासभा ने कहा कि इस नियमावली का अस्तित्व में आना जन-संघर्षों और जन-भागीदारी की सफलता का प्रमाण है। स्वयं झारखंड जनाधिकार महासभा ने इस पूरी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई—गांव-गांव जाकर पेसा कानून के प्रति जागरूकता फैलाने, पर्चे बांटने, राजधानी में धरना-प्रदर्शन आयोजित करने और एक जन-पक्षीय ड्राफ्ट तैयार कर सरकार को सौंपने तक।
महासभा ने इस बात की सराहना की कि राज्य सरकार ने नियमावली के निर्माण में जन संगठनों, विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सुझावों को प्राथमिकता दी। महासभा का मानना है कि कानून और नीति निर्माण की यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जिसे हर स्तर पर अपनाया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को भी झारखंड की इस समावेशी प्रक्रिया से सीख लेनी चाहिए, जहां कानून जनता पर थोपे नहीं गए, बल्कि जनता की भागीदारी से बनाए गए।
JPRA में संशोधन के बिना नियमावली अधूरी
हालांकि, महासभा ने यह भी स्पष्ट किया कि झारखंड पंचायत राज अधिनियम (JPRA), 2001 में संशोधन के बिना पेसा नियमावली अधूरी रहेगी। जब तक मूल पंचायत कानून में पेसा के सभी प्रावधानों को शामिल नहीं किया जाता, तब तक पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकार और प्रशासनिक संरचना पूर्ववत बनी रहेगी और ग्राम सभा के निर्णयों में हस्तक्षेप की आशंका बनी रहेगी।
महासभा ने चेताया कि पेसा नियमावली एक नियम है, जबकि JPRA एक कानून है। यदि दोनों में किसी प्रकार का विरोधाभास हुआ, तो नौकरशाही कानून का हवाला देकर ग्राम सभा के निर्णयों को कमजोर कर सकती है।
महासभा ने सरकार से यह भी मांग की कि स्वीकृत नियमावली को अविलंब सार्वजनिक किया जाए और सभी ग्राम सभाओं तक इसकी प्रतियां भेजी जाएं।
झारखंड जनाधिकार महासभा की प्रमुख मांगें
- राज्य सरकार बिना देरी किए JPRA में संशोधन कर उसे पेसा कानून की मूल भावना के अनुरूप बनाए।
- पेसा नियमावली का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए और इसे स्थानीय भाषाओं में गांव-गांव तक पहुंचाया जाए। साथ ही जिला प्रशासन और पुलिस को उनके सीमित अधिकारों को लेकर सख्त प्रशिक्षण दिया जाए।
- अगले छह महीनों के भीतर भूमि, वन और खनिज से जुड़े सभी राज्य कानूनों को पेसा नियमावली के अनुरूप संशोधित किया जाए।
- नियमावली के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मुख्य सचिव के नेतृत्व में एक उच्च-स्तरीय निगरानी तंत्र गठित किया जाए।
- सरकार हर महीने जन संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पारंपरिक नेतृत्व के साथ समीक्षा बैठक करे, ताकि जमीनी फीडबैक के आधार पर सुधार संभव हो।
- पेसा कानून की धारा 4(o) के तहत छठी अनुसूची के व्यापक प्रावधानों और शक्तियों को कोल्हान, संथाल परगना जैसे पारंपरिक आदिवासी स्वायत्त क्षेत्रों में लागू करने की संभावनाओं पर विचार हेतु एक विशेष समिति का गठन किया जाए।
महासभा ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए सभी संघर्षशील साथियों को बधाई दी और दोहराया कि “अबुआ दिसुम, अबुआ राज” के सपने को साकार करने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। महासभा ने यह भी कहा कि नियमावली के अधिसूचित होने के बाद, वह अपने जन-पक्षीय ड्राफ्ट से इसकी तुलना कर विस्तृत टिप्पणी सार्वजनिक करेगी।
— झारखंड जनाधिकार महासभा
