नई दिल्ली में आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच का दो दिवसीय सम्मेलन संपन्न हुआ। 15 राज्यों के प्रतिनिधियों ने अधिकार, रोजगार, शिक्षा और पहचान पर चर्चा की।
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नई दिल्ली के रफी मार्ग स्थित जीबी मावलंकर हॉल में आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच का दो दिवसीय राष्ट्रीय संघर्ष सम्मेलन संपन्न हुआ। सम्मेलन में देश के 15 राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और आदिवासी समुदाय से जुड़े विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और पहचान संबंधी मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की समस्याओं के समाधान के लिए संवेदनशील दृष्टिकोण और प्रभावी नीतिगत पहल जरूरी है।
15 राज्यों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
राष्ट्रीय संघर्ष सम्मेलन में देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचे प्रतिनिधियों ने आदिवासी समुदाय के सामने मौजूद चुनौतियों को साझा किया। सम्मेलन का उद्देश्य आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवालों पर व्यापक चर्चा करना और भविष्य के संघर्ष एवं जन पहल की दिशा तय करना रहा।
कार्यक्रम में झारखंड सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने स्थानीय स्तर पर आदिवासी समाज की स्थिति और समस्याओं पर अपने अनुभव रखे। सम्मेलन में आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच से जुड़े प्रतिनिधियों ने अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ रोजगार, शिक्षा और आदिवासी पहचान जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया।
रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज ने किया उद्घाटन
सम्मेलन का उद्घाटन सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज मदन ने किया। उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि यदि समाज आदिवासियों के प्रति थोड़ी संवेदनशीलता दिखाए तो उनकी अधिकांश समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

उन्होंने आदिवासी समुदाय के मुद्दों को केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक संवेदनशीलता के साथ देखने की जरूरत पर जोर दिया। उनके अनुसार, आदिवासी समाज की परिस्थितियों और उनकी विशिष्ट जरूरतों को समझना समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
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अधिकार, रोजगार और शिक्षा पर चर्चा
त्रिपुरा के विपक्ष के नेता जितेंद्र चौधरी ने स्वागत भाषण दिया। इसके बाद सम्मेलन में आदिवासी समुदाय से जुड़े चार प्रमुख मुद्दों पर विशेष चर्चा हुई। इनमें अधिकार, रोजगार, शिक्षा और आदिवासी पहचान प्रमुख रहे।
प्रतिनिधियों ने कहा कि आदिवासी समुदाय के विकास के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसरों का विस्तार बेहद जरूरी है। वहीं, संवैधानिक और सामाजिक अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा के साथ आदिवासी पहचान से जुड़े सवालों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
सम्मेलन में चर्चा के दौरान प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों की परिस्थितियों और समस्याओं को सामने रखा। उनका कहना था कि आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों का समाधान स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।
