पांच पदक जीतने वाली सुनीता उरांव आज झाड़ू-पोछा करने को मजबूर

सुनीता उरांव ने झारखंड के लिए दो स्वर्ण समेत पांच पदक जीते हैं। आज रांची में करीब 10 हजार रुपये की नौकरी कर परिवार चला रही हैं और खेल कोटे से नौकरी चाहती हैं।

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रांची। कभी खेल के मैदान में झारखंड का प्रतिनिधित्व कर सुनीता उरांव ने दो स्वर्ण समेत पांच पदक जीतकर राज्य का नाम रोशन किया था। थ्रो बॉल और वॉलीबॉल की खिलाड़ी रहीं सुनीता ने तमिलनाडु और राजस्थान में आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। लेकिन आज उनकी जिंदगी की तस्वीर बेहद अलग है। रांची के मोरहाबादी स्थित खेल निदेशालय परिसर में वह पिछले करीब आठ से नौ वर्षों से झाड़ू-पोछा कर अपना और परिवार का गुजारा कर रही हैं।

मैदान की खिलाड़ी से सफाईकर्मी तक का सफर

सुनीता उरांव ने अपने खेल करियर के दौरान झारखंड का प्रतिनिधित्व किया। थ्रो बॉल और वॉलीबॉल जैसे खेलों में उन्होंने विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर कुल पांच पदक हासिल किए, जिनमें दो स्वर्ण पदक भी शामिल हैं।

कभी खेल के मैदान पर पदक जीतने वाली खिलाड़ी आज उसी खेल व्यवस्था से जुड़े परिसर में सफाई का काम कर रही हैं। उनकी कहानी इस सवाल को सामने लाती है कि खेल में उपलब्धियां हासिल करने वाले खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिता के बाद रोजगार और सम्मानजनक भविष्य सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

आठ-नौ साल से कर रही हैं सफाई का काम

सुनीता के मुताबिक, वह करीब आठ से नौ वर्षों से खेल निदेशालय परिसर में सफाई का काम कर रही हैं। इस काम के बदले उन्हें लगभग 10 हजार रुपये प्रतिमाह मेहनताना मिलता है। उनका कहना है कि कई बार भुगतान समय पर नहीं हो पाता, जिससे आर्थिक परेशानियां और बढ़ जाती हैं।

सुनीता उरांव

किराये के मकान में रहने वाली सुनीता उरांव की आय का बड़ा हिस्सा घर के खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों में चला जाता है। सीमित आमदनी के बीच परिवार की जिम्मेदारियां निभाना उनके लिए लगातार चुनौती बना हुआ है।

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माता-पिता को खो चुकीं, परिवार चलाने की जिम्मेदारी

सुनीता अपने माता-पिता को खो चुकी हैं और फिलहाल भाई-भाभी के साथ रहती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के कारण खेल को आगे बढ़ाने के बजाय उन्हें रोजगार की तलाश में सफाई का काम करना पड़ा।

उनकी परिस्थितियां बताती हैं कि आर्थिक मजबूरियां किस तरह किसी प्रतिभाशाली खिलाड़ी को उसके पसंदीदा खेल से दूर कर सकती हैं। पदक जीतने के बावजूद स्थायी रोजगार नहीं मिलने के कारण सुनीता को परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसा काम करना पड़ रहा है, जिसे उन्होंने अपने भविष्य के रूप में कभी नहीं चुना था।

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